तज़किरए सालिहात 02📚

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*❤🌹तज़किरए सालिहात* #02📚

بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ    ❤                   

اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ❤

*हज़रते बीवी खदीजा रदिअल्लाहु तआला अन्हा*
इस बात पर सारी उम्मत का इत्तिफाक है कि सब से पहले हुज़ूर ﷺ की नुबूव्वत पर येही ईमान लाई और इब्तिदाए इस्लाम मे जब की हर तरफ आप ﷺ की मुखालफ़त का त़ूफान उठा हुवा था ऐसे खौफनाक और कठिन वक़्त मे सिर्फ एक हज़रते खदीजा की ही जाते पाक थी जो परवानो की तरह हुज़ूर ﷺ पर कुरबान हो रही थीं और इतने खतरनाक अवकात मे जिस इस्तिकलाल व इस्तिकामत के साथ इन्हो ने खतरात व मसाइब का मुकाबला किया ,इस खुसूसिय्यत में तमाम अज़वाजे मुत़ह्हारात पर इन को एक मुमताज फज़ीलत हासील है।

इन की फज़ाइल मे बहुत सी हदीसे भी आई है चुनान्चे हुज़ूरे अकरम ﷺ ने फरमाया कि तमाम दुनिया की औरतो में सब से जियादा अच्छी और बा कमाल चार बीबियाँ है एक हज़रते मरयम,दूसरी हज़रते आसीया, तीसरी हज़रते खदीजा, चौथी हज़रते फातीमा।

एक मरतबा हज़रते जिब्रईल दरबारे नुबुव्वत मे हाज़िर हुए और अर्ज़ किया कि ऐ मुहम्मद ﷺ येह खदीजा हैं जो आप के पास एक बरतन मे खाना लेकर आ रही हैं जब यह आप ﷺ के पास आ जाएं तो इन से इन के रब ﷻ का और मेरा सलाम कह दीजिये और इन को यह खुशखबरी सुना दीजिये कि जन्नत में इन के लिये मोती का एक घर बना है जिस में न कोई शोर होगा न कोई तक्लीफ होगी।

सरकारे दोजहाँ ﷺ ने इन की वफात के बाद बहुत सी औरतो से निकाह फरमाया लेकिन हज़रते खदीजा की महब्बत आखिर उम्र तक हुज़ूर ﷺ के क़ल्बे में रची बसी रही यहां तक कि इन की वफात के बाद जब भी हुज़ूर ﷺ के घर मे कोई बकरी जिब्ह होती तो आप ﷺ हज़रते खदीजा की सहेलियों के यहाँ भी जरूर गोश्त भेजा करते थे और हमेशा आप ﷺ बार बार हज़रते बीबी खदीजा का जिक्र फरमाते रहते थे हिज़रत से तीन बरस कब्ल पैंसठ बरस की उम्र पा कर माहे रमज़ान मे मक्कए मुकर्रमा के अन्दर आपने वफात पाई और मक्कए मुकर्रमा के मशहूर कब्रिस्तान ह़जून (जन्नतुल मा’ला) में खुद हुज़ूरे अक्दस ﷺ ने इन की कब्र मे उतर कर अपने मुकद्दस हाथो से इन को सिपुर्दे खाक फरमाया उस वक्त तक नमाजे जनाज़ा का हुक्म नाज़िल नही हुवा था इस लिये हुज़ूर ﷺ ने इन की नमाज़ नही पढ़ाई हज़रते खदीजा की वफात से तीन या पांच दिन पहले हुज़ूर ﷺ के चचा अबू तालीब का इन्तिकाल हो गया था अभी चचा की वफात के सदमे से हुज़ूर ﷺ गुज़रे ही थे कि हज़रते खदीजा का इन्तिकाल हो गया इस सानिहे का कल्बे मुबारक पर इतना ज़बरदस्त सदमा गुज़रा कि आप ने इस साल का नाम *”आमुल हुज़्न”*(गम का साल) रख दिया।
*जन्नती ज़ेवर सफ़ह़ा 479 ,480*
_येही माएं हैं जिन की गोद मे इस्लाम पलता था_
_इसी गै़रत से इन्सां नूर के सांचे मे ढलता था_
_✍ बाकि अगली पोस्ट में..ان شاء الله_❤🌹🌹
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